भारत की शिक्षानीति में बदलाव एक युवा देश की ज़रूरत

भारत एक अदभुत देश है | दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहाँ इतना ज्यादा आबादी घनत्व और इतनी सारे जाती – धर्म एक साथ बस्ते हों | इतनी ज्यादा आबादी और जातियां एक अभिशाप भी हैं और एक वरदान भी | खैर ये तो अपना अपना सोचने का नज़रिया है, असल में सिक्के का कोनसा पहलु हमारे मानस पटल पर आघात करता है ये उसका परिणाम है | मेरा मानना है कि आज भारत के पास जो युवा शक्ति है वह दूसरे किसी देश के पास शायद ही हो | परन्तु हमारी मौजूदा सरकार जिस पर इस युवा शक्ति को इस्तेमाल करके एक नया और मजबूत भारत बनाने का दारोमदार है वो इससे बर्बाद करने पर तुली हुई है |

हाल ही में मैंने एक हिंदी के प्रोफेस्सर का लेख पढ़ा था जिनकी सारी चिंता आज की उच्च शिक्षा पद्यति पर थी | उनकी चिंता नाजायज़ नहीं थी | असल में आज हमारे देश में जो युवा है उसका अधिक से अधिक ध्यान उच्च शिक्षा पर ही केंद्रित है | पर उच्च शिक्षा का जो मकसद है वो उस युवा को शायद ही पता हो | मुझे आश्चर्य होता है जब में अमेरिका और ब्रिटेन के लोगों द्वारा किये जा रहे अविष्कार या काम को देखता हूँ | उनके ऊच्तम पदों पर कोई न कोई भारतीय नज़र आ ही जाता है पर उस काम कि सोच हमेशा किसी अमेरिकन, ब्रिटिश या कोई और देश की होती है | हमारा युवा भले ही उच्च शिक्षा प्राप्त करके एक बड़ी कंपनी का बड़ा अधिकारी बन जाता है पर एक बड़ी कंपनी बनाने के लिए जिस स्वतंत्र और जीवंत सोच की ज़रूरत होती है वो आज के उच्च शिक्षा प्राप्त भारतीय युवा में नदारद है | शायद इसी का परिणाम है की हम बहतरीन इंजिनियर तो बना रहे हैं पर एक बेहतर नागरिक और स्वतंत्र सोच वाला इंसान बनाने में पिछड गए हैं |

मैं ये कतई नहीं कहता की इसमें सारा दोष हमारे युवाओं का है | हाँ, कुछ दोष तो ज़रूर है, परन्तु अधिकतम दोष हमारी शिक्षा निति निर्धारित करने वाली सरकार का है | रविंद्रनाथ टैगोर जी ने कहा था की अगर इंसान खुले आसमान के नीचे पढ़े तो उसकी सोच में एक खुलापन और गहराई आती है | मैं इस बात से सहमत हूँ | अक्सर कहा जाता है जब भी पढाई का कोई काम करो तो तुम्हारे सामने खुली जगह होनी चाहिए जिससे तुम्हारे विचारों को स्वछंद होने का मौका मिले, इसे आज का विज्ञानं भी मानता है | परन्तु आज हमारे विश्वविद्यालयो के कमरे इतने छोटे होते जा रहे हैं जिसमे शायद ही 20-30 बेंच आ सकें | इसका परिणाम भी हमारे सामने है | आज कितने विद्यार्थी अपने अध्यापक से एक अच्छा वाद – विवाद कर पाते हैं ?

पर ये बात यही खत्म नहीं होती | असल में इस लाचारी का एक बड़ा कारण हमारे देश की विफल शिक्षा निति है | आज विकसित देशो मैं पेशेवर युवाओं की बहुत मांग है और भारत इस मांग का एक बड़ा केंद्र है | शायद इसी वजह से आज हमारी शिक्षा निति सिर्क किताबी ज्ञान तक सिमित कर दी गयी है | इन विकसित देशों मैं काम करने का जो चाव आज हमारे युवा के मन मैं समा गया है वो इसी शिक्षा निति की वजह से है | आज लोग शोध करना चाहते तो हैं परन्तु शोध के लिए जो सुविधा किसी उच्च शिक्षा प्राप्त विद्यार्थी को मिलनी चाहिए उसका 20% भी नहीं मिल पाती | इसी वजह से आज शोध के विद्यार्थी कम होते जा रहे हैं | जिनके पास पैसे हैं वे तो विदेश जाकर अपना शोध का काम शुरू कर लेते हैं पर उनका क्या जिनके पास इतना धन तो नहीं पर काबिलियत और हौसला है | उनके शोध की ललक का आज की शिक्षानीति क़त्ल कर देती है और मजबूरन उसे वो रास्ता छोड कर कोई व्यावसायिक काम करना पड़ता है |

अगर आने वाले कुछ सालों में ही कोई अच्छी शिक्षानीति नहीं बनायीं गयी तो आने वाले 30 सालों में जब ये देश एक बुढा देश बनेगा तो इसे बिखरने से कोई नहीं बचा पायेगा | वो पुरानी नीतियां बदलने का सही समय आ गया है |