भारत बिकाऊ है – बस खरीदार चाहिए

कुछ भी लिखने से पहले मैं ये बता देना चाहता हूँ की इस लेख का शीर्षक एक व्यंग्य है, मेरा मकसद किसी की भावनाओं को ठेस पहुचने का नहीं है |

मैं भारतवासी हूँ, मुझे इस बात पर गर्व है, इसलिए नहीं क्यूंकि हमें ये पढाया जाता है या आज 26 जनवरी या 15 अगस्त है बल्कि इसलिए की हमारी रगों में वो खून दौड रहा है जो चाणक्य की रगों में, पृथ्वीराज चौहान की रगों में, स्वामी विवेकानंद की रगों में दौड रहा था | कैसे भूल जाऊँ में श्री कृष्ण, सरदार पटेल, महात्मा गाँधी, भगत सिंह, नेताजी सुभाष चंद्र बोस को | कैसे भुला दूँ मैं भारतीय संस्कृति को जो इंसान को इंसान समझना सिखाती है | मैं ये सब चाह कर भी नहीं भुला सकता |

पर आज जो दुर्दशा मेरे देश की हो रही है वो शायद इतिहास कई बार दोहरा चुका है | लेकिन इस बार एक अनोखी बात हो रही है | इतिहास गवाह है, पहले कोई न कोई विदेशी लुटेरा भारत पर आक्रमण करके यहाँ के लोगों को अपना गुलाम बना लेता था | यहाँ की व्यवस्था को छिन्नभिन्न करके लोगों का शोषण करता था | आज भी वही हो रहा रहा है, सारी व्यवस्था को छिन्नभिन्न किया जा रहा है और ये काम कोई और नहीं हमारे अपने चुने हुए लोग ही कर रहे हैं |

अगर आपके पास थोडा समय हो तो कृपया अपनी थोड़ी आँखे खोलें और देखने का प्रयास करें की आखिर ये हो क्या रहा है | अगर आप थोडा गौर से देखंगे तो आपको भी मेरी तरह यकीन हो जायेगा की भारत बिकाऊ है – बस खरीदार चाहिए |

हर सरकारी मेहेक्मे को या तो तहसनहस किया जा रहा है या उसके द्वारा दी जाने वाली सुविधा को बेहद खराब किया जा रहा है | कभी आपने सोचा है, आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ? क्या आपको लगता है की कोई भी सरकार सरकारी मेहेक्मों को संभालने मैं नाकाम हो सकती है | कम से कम मुझे तो ऐसा नहीं लगता | हमारे सरकारी विभाग क्या इतनी खराब कर दिए जाते है की उन्हें बंद करना ही एक मात्र विकल्प बचता है | मुझे ऐसा नहीं लगता | अगर कोई सरकार किसी सेवा विभाग को चला नहीं सकती तो वो देश क्या चलाएगी | इन देसी लुटेरों को बस एक बात आती है , सब प्राइवेट कर दो और उन कंपनियों से अपने बैंक अकाउंट भरवा लो |

मेरे घर की कुछ दुरी पर  संस्कृत का एक राष्ट्रीय संस्थान है | मेरी माता जी को संस्कृत पढ़ने का बड़ा चाव है तो मैं एक दिन इस संस्थान में उनके द्वारा चलाये जा रहे पाठ्यक्रम का पता करने गया | संस्थान की बिल्डिंग बड़ी शानदार है | मैं जैसे ही अंदर घुसा डेस्क पर बैठे एक कुत्ते से मेरी भेंट हुई | मैंने आसपास देखा की शायद कोई गार्ड इधर उधर हो | मुझे कोई नहीं मिला जो मुझे ये बता सके की मुझे जाना कहाँ है और किससे मिलना है | खैर, मैं भी आज़ाद देश का नागरिक ठहरा, अंदर गया तो समझ आया आखिर सब कर्मचारी हैं कहाँ | एक बड़ा सा कमरा था | कंप्यूटर, मेज कुर्सी, AC सब था वहाँ | बस कमी थी तो काम करने वाले लोगों की | नहीं कमरा खाली नहीं था | कमरे में लगभग सारे कर्मचारी थे पर सब सो रहे थे | कोई कुर्सी पर तो किसी ने नीचे फर्श पर ही अखबार को अपना बिस्तर बनाया  था | इतनी एकता किसी सरकारी विभाग में मैंने पहली बार देखि थी | खैर मैं वह से उलटे पैर लौट आया | जिस संस्थान का ये हाल हो वहाँ पढाई भला क्या होती होगी | अपनी माता जी के लिए मैंने इन्टरनेट से ही कुछ संस्कृत की किताबें खोज कर दे दी |

इस बात को लगभग 3 साल हो गए | पर आज ये हाल लगभग हर सरकारी विभाग में है | क्या इसे ठीक नहीं किया जा सकता | मंत्री क्या, एक सरकारी अफसर भी चाहे तो हर विभाग ठीक किया जा सकता है | खैर जब वो विभाग इतना खराब और भ्रष्ट कर दिया जाता है तो सरकार फिर सौदा करना शुरू करती है | अगर वो विभाग किसी प्रकार की सेवा देता है जैसे बिजली, पानी तो उसे प्राइवेट करने का नाटक किया जाता है | जनता को ये विश्वास दिलाया जाता है की प्राइवेट होते ही आपको अच्छी सुविधाएं मिलेंगी | जनता भी बेचारी भोली है | बिना किसी विरोध के सब होने देती है, आखिर मेरे बाप का क्या जाता है, करलो  | सरकार इसी मानसिकता का फायदा उठाते हुए हर सरकारी सेवा विभाग को प्राइवेट करने पर काम कर रही है |

मुझे एक बात समझ नहीं आती, सरकार के पास इतनी ताकत होते हुए भी जब वो किसी विभाग को ठीक नहीं कर पाती तो एक अदनी सी प्राइवेट कंपनी ऐसा कैसे कर देगी | खैर, हम जो भी कहें उसका सरकार पर भला क्या फर्क पड़ने वाला है | उसका बस चले तो सारे सरकारी तंत्र को एक साथ प्राइवेट कर दे और कौन जाने वो प्राइवेट कंपनी देशी हों या विदेशी | पर इस से फर्क भी क्या पड़ने वाला है, प्राइवेट कंपनी तो खून ही चूसेगी, देशी हो या विदेशी |

बिजली तो प्राइवेट हो ही गयी है ( कम से कम दिल्ली में तो है ही ) पर सुविधा का जो वादा था वो आज भी जस का तस है | हां आये दिन बिजली के दाम ज़रूर बढ़ जाते हैं, ऊपर से सरकार उन्हें सब्सिडी भी देती है | मतलब हमसे भी लेती है और सरकार से भी हमारा ही पैसा और ले लेती है | वाह रे देश के नेतओं, क्या लूट मचाई है |

वैसे जब कोई बच्चा गलत राह पर निकल जाता है तो काफी हद तक उसकी ज़िम्मेदारी उसके घरवालों की होती है | जी हाँ आप सही समझे, जो देश के हालात हैं वो किसी नेता के नहीं हमारे ( जनता के )बनाये हुए हैं | हम ही बिना सोचे समझे किसी को भी वोट कर आते हैं | चुनाव से बस थोडा पहले जब ये लोग ( नेता ) आपको मोबाइल, घर का वादा, कपडे, शराब बांटते हैं आप भी उस दो दिन की चांदनी में आँखे बंद कर लेते हैं जैसे ये सब रोज होने वाला है | पर जैसे की चुनाव खत्म हुए, वही लोग आपके बच्चे के मुह से निवाला छीनना शुरू कर देते हैं |

वोट डालना जितना ज़रुरी है उस से भी ज्यादा ज़रुरी है अच्छे उम्मेदवार को वोट डालना | क्यूंकि किसी भ्रष्ट को वोट डालोगे तो वो तुम्हारे ही घर मैं आग लगायेगा | आखिर गलती की सज़ा तो भुगतनी ही पड़ती है |

एक कहावत है : बोए पेड़ बबूल के तो आम कहाँ से होए |

हमारी चुनी हुई सरकार पर इतने तीक्षण प्रहार के लिए में माफ़ी मांगता हूँ | पर ये माफ़ी मांगू तो किस से, आखिर हम सब अपनी सरकार पर ही तो शर्मिंदा हैं |

भारत की शिक्षानीति में बदलाव एक युवा देश की ज़रूरत

भारत एक अदभुत देश है | दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहाँ इतना ज्यादा आबादी घनत्व और इतनी सारे जाती – धर्म एक साथ बस्ते हों | इतनी ज्यादा आबादी और जातियां एक अभिशाप भी हैं और एक वरदान भी | खैर ये तो अपना अपना सोचने का नज़रिया है, असल में सिक्के का कोनसा पहलु हमारे मानस पटल पर आघात करता है ये उसका परिणाम है | मेरा मानना है कि आज भारत के पास जो युवा शक्ति है वह दूसरे किसी देश के पास शायद ही हो | परन्तु हमारी मौजूदा सरकार जिस पर इस युवा शक्ति को इस्तेमाल करके एक नया और मजबूत भारत बनाने का दारोमदार है वो इससे बर्बाद करने पर तुली हुई है |

हाल ही में मैंने एक हिंदी के प्रोफेस्सर का लेख पढ़ा था जिनकी सारी चिंता आज की उच्च शिक्षा पद्यति पर थी | उनकी चिंता नाजायज़ नहीं थी | असल में आज हमारे देश में जो युवा है उसका अधिक से अधिक ध्यान उच्च शिक्षा पर ही केंद्रित है | पर उच्च शिक्षा का जो मकसद है वो उस युवा को शायद ही पता हो | मुझे आश्चर्य होता है जब में अमेरिका और ब्रिटेन के लोगों द्वारा किये जा रहे अविष्कार या काम को देखता हूँ | उनके ऊच्तम पदों पर कोई न कोई भारतीय नज़र आ ही जाता है पर उस काम कि सोच हमेशा किसी अमेरिकन, ब्रिटिश या कोई और देश की होती है | हमारा युवा भले ही उच्च शिक्षा प्राप्त करके एक बड़ी कंपनी का बड़ा अधिकारी बन जाता है पर एक बड़ी कंपनी बनाने के लिए जिस स्वतंत्र और जीवंत सोच की ज़रूरत होती है वो आज के उच्च शिक्षा प्राप्त भारतीय युवा में नदारद है | शायद इसी का परिणाम है की हम बहतरीन इंजिनियर तो बना रहे हैं पर एक बेहतर नागरिक और स्वतंत्र सोच वाला इंसान बनाने में पिछड गए हैं |

मैं ये कतई नहीं कहता की इसमें सारा दोष हमारे युवाओं का है | हाँ, कुछ दोष तो ज़रूर है, परन्तु अधिकतम दोष हमारी शिक्षा निति निर्धारित करने वाली सरकार का है | रविंद्रनाथ टैगोर जी ने कहा था की अगर इंसान खुले आसमान के नीचे पढ़े तो उसकी सोच में एक खुलापन और गहराई आती है | मैं इस बात से सहमत हूँ | अक्सर कहा जाता है जब भी पढाई का कोई काम करो तो तुम्हारे सामने खुली जगह होनी चाहिए जिससे तुम्हारे विचारों को स्वछंद होने का मौका मिले, इसे आज का विज्ञानं भी मानता है | परन्तु आज हमारे विश्वविद्यालयो के कमरे इतने छोटे होते जा रहे हैं जिसमे शायद ही 20-30 बेंच आ सकें | इसका परिणाम भी हमारे सामने है | आज कितने विद्यार्थी अपने अध्यापक से एक अच्छा वाद – विवाद कर पाते हैं ?

पर ये बात यही खत्म नहीं होती | असल में इस लाचारी का एक बड़ा कारण हमारे देश की विफल शिक्षा निति है | आज विकसित देशो मैं पेशेवर युवाओं की बहुत मांग है और भारत इस मांग का एक बड़ा केंद्र है | शायद इसी वजह से आज हमारी शिक्षा निति सिर्क किताबी ज्ञान तक सिमित कर दी गयी है | इन विकसित देशों मैं काम करने का जो चाव आज हमारे युवा के मन मैं समा गया है वो इसी शिक्षा निति की वजह से है | आज लोग शोध करना चाहते तो हैं परन्तु शोध के लिए जो सुविधा किसी उच्च शिक्षा प्राप्त विद्यार्थी को मिलनी चाहिए उसका 20% भी नहीं मिल पाती | इसी वजह से आज शोध के विद्यार्थी कम होते जा रहे हैं | जिनके पास पैसे हैं वे तो विदेश जाकर अपना शोध का काम शुरू कर लेते हैं पर उनका क्या जिनके पास इतना धन तो नहीं पर काबिलियत और हौसला है | उनके शोध की ललक का आज की शिक्षानीति क़त्ल कर देती है और मजबूरन उसे वो रास्ता छोड कर कोई व्यावसायिक काम करना पड़ता है |

अगर आने वाले कुछ सालों में ही कोई अच्छी शिक्षानीति नहीं बनायीं गयी तो आने वाले 30 सालों में जब ये देश एक बुढा देश बनेगा तो इसे बिखरने से कोई नहीं बचा पायेगा | वो पुरानी नीतियां बदलने का सही समय आ गया है |