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Dec 21, 2011 - Poems in Hindi    No Comments

समय चल रहा टिक टिक


घडी चल रही टिक टिक, समय चल रहा टिक टिक

अभी तो मैं था बच्चा, अक्ल का था थोडा कच्चा
गलती करता था हर पल, डांट खाता था हर पल
बहुत करता था गिट-पिट, समय चल रहा टिक टिक |

अभी तो पढ़ना सीखा था, थोडा ही चलना सीखा था
बहुत बोला करता था, हाथ ना आया करता था
सब सुनते थे मेरी गिट-पिट, समय चल रहा टिक टिक |

स्कूल जाने से डरता था, फिर भी जाना पड़ता था
रोता था बिलखता था, पर जाना ही पड़ता था
फिर दोस्तों में हुई गिट-पिट, समय चल रहा टिक टिक |

रोज मस्ती करता था, मन लगाकर पढता था
ना थी कोई चिंता, ना फ़िक्र कोई मैं करता था
फिर गर्ल-फ्रेंड से हुई गिट-पिट,समय चल रहा टिक टिक |

कसमें वादे करता था, रोज़ उस से मिलता था
घंटो बाते करने में, समय का पता ना चलता था
थोड़ी और हुई गिट-पिट, समय चल रहा टिक टिक |

अब थोड़ी ज़िम्मेदारी आई, पैसे कमाने की बारी आई
सुबह जाया करता था, रात में आया करता था
थोड़ी ही होती थी गिट-पिट, समय चल रहा टिक टिक |

टिक-टिक, टिक-टिक के चक्कर में आधी उम्र बीत गयी
ऐसा लगता था जैसे, जिंदगी सब कुछ सीख गयी
अब समय को करनी थी गिट-पिट, समय चल रहा टिक टिक |

पिता जी का देहांत हुआ, जैसे सब कुछ अंत हुआ
थोडा मन को शांत करके, फिरसे वापस खड़ा हुआ
फिरसे चल पड़ी गिट-पिट, समय चल रहा टिक टिक |

समय आगे चलता गया, में भी आगे बढ़ता गया
शादी हुई, बच्चे हुए, सब आराम से चलता गया
बच्चे करते थे गिट-पिट, समय चल रहा टिक टिक |

अब पीछे मुड़कर देखा मैंने, क्या पूरा जीवन जिया मैंने ?
बहुत कुछ अधूरा था, पर जीवन हो चूका पूरा था
खत्म हुई सारी गिट-पिट, समय चल रहा टिक टिक |

Dec 21, 2011 - Poems in Hindi    No Comments

जिंदगी एक सफर |

मैं फिर चल पड़ा आज, यूँ ही किसी सफर पर |
जाना कहाँ था ये थी नहीं खबर |

हमसफ़र मिला चलते चलते, साथ चला कुछ पल |
फिर एक मोड पर बिछड गयी डगर |

मैं फिर चल पड़ा आज, यूँ ही किसी सफर पर |
जाना कहाँ था ये थी नहीं खबर |